भारत और चीन के रिश्तों में पिछले कुछ समय से आई नरमी के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और भारत के रणनीतिक रुख पर चीन में भी चर्चा तेज हो गई है। खासकर ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों पर भारत के संतुलित रुख को चीनी विश्लेषणों में अहम माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच लंबे समय तक चले तनाव के बाद अब बातचीत और सहयोग का दौर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। चीन में भारत को लेकर बदला नजरिया चीनी अधिकारियों के हालिया बयानों में भारत को सिर्फ एक पड़ोसी देश के तौर पर नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण विकासशील शक्ति और ग्लोबल साउथ के प्रमुख देश के रूप में देखा गया है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने जुलाई में कहा था कि भारत और चीन “प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझेदार” हैं और दोनों देशों को एक-दूसरे के विकास को अवसर के रूप में देखना चाहिए। चीन की ओर से यह भी कहा गया है कि दोनों देशों के बीच संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से आगे बढ़ाने की जरूरत है। सीमा पर शांति बनाए रखने, आर्थिक सहयोग बढ़ाने और उच्चस्तरीय संवाद जारी रखने पर भी जोर दिया जा रहा है। मोदी के रुख में चीन को क्या दिख रहा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू रणनीतिक स्वायत्तता रहा है। भारत एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत रखता है, तो दूसरी तरफ रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी संवाद बनाए रखता है। SCO को लेकर हालिया अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों में भी कहा गया है कि भारत की भागीदारी चीन के प्रभाव को संतुलित करने वाली भूमिका निभाती है। साथ ही, अमेरिका के साथ व्यापार और रणनीतिक चुनौतियों के बीच भारत का चीन के साथ संवाद बढ़ाना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शी जिनपिंग के भारत दौरे से बढ़ी उम्मीदें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आ रहे हैं। यह सात साल बाद उनकी भारत यात्रा होगी। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बातचीत होने की उम्मीद है। बैठक में सीमा विवाद, व्यापार, निवेश और दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने जैसे मुद्दे अहम रह सकते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। भारत-चीन रिश्तों में नई दिशा? चीन की ओर से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि दोनों देशों को अपने मतभेदों को नियंत्रित करते हुए सहयोग के क्षेत्रों को बढ़ाना चाहिए। वहीं भारत भी सीमा पर शांति और स्थिरता को द्विपक्षीय संबंधों में प्रगति की अहम शर्त मानता रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की आगामी मुलाकात को सिर्फ एक कूटनीतिक बैठक नहीं, बल्कि भारत-चीन संबंधों की अगली दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, दोनों देशों के बीच वास्तविक भरोसा और सहयोग कितना बढ़ता है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। Post navigation नेपाल में Flash Flood से पहले Glacier Collapse का वीडियो, Drone Camera ने कैद किया पूरा पल