ईरान ने अमेरिका के साथ Islamabad में हुई हाई-प्रोफाइल शांति वार्ता के विफल होने के लिए सीधे तौर पर अमेरिकी पक्ष को जिम्मेदार ठहराया है। Tehran का कहना है कि बातचीत इसलिए टूट गई क्योंकि अमेरिका ने “अनुचित और अव्यावहारिक मांगें” रखीं, जिन्हें स्वीकार करना ईरान के लिए संभव नहीं था।

यह बयान उस समय आया जब 21 घंटे चली लंबी बातचीत के बाद दोनों देश बिना किसी समझौते के वार्ता टेबल से उठ गए। यह बैठक मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव को कम करने की एक बड़ी कूटनीतिक कोशिश मानी जा रही थी।

ईरान ने क्या कहा?

ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, उनके प्रतिनिधिमंडल ने “लगातार और गंभीरता से” वार्ता की, लेकिन अमेरिकी मांगों ने प्रगति रोक दी। Tehran का दावा है कि उसने कई वैकल्पिक प्रस्ताव दिए, फिर भी समझौता नहीं हो सका।

किन मुद्दों पर फंसी बात?

रिपोर्ट्स के अनुसार मुख्य विवाद इन मुद्दों पर था:

1. परमाणु कार्यक्रम

अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंध माने।

2. Strait of Hormuz

Hormuz जलडमरूमध्य की सुरक्षा और नियंत्रण पर भी गंभीर मतभेद रहे।

3. प्रतिबंधों में राहत

ईरान ने अमेरिकी sanctions में व्यापक राहत की मांग की, जिस पर सहमति नहीं बनी।

अमेरिका का रुख

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे JD Vance ने कहा कि अमेरिका ने अपना “best and final offer” दिया था और अब फैसला ईरान के हाथ में है।

उनके बयान से संकेत मिला कि वॉशिंगटन को उम्मीद थी कि Tehran प्रस्ताव स्वीकार करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

वैश्विक असर क्या होगा?

इस वार्ता के टूटने से:

  • Middle East में तनाव फिर बढ़ सकता है
  • तेल बाजार में अस्थिरता आ सकती है
  • Hormuz route की सुरक्षा चिंता बढ़ सकती है
  • Ceasefire कमजोर पड़ सकता है

विशेषज्ञों का मानना है कि असफलता का असर वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा बाजार दोनों पर पड़ेगा।

आगे क्या?

फिलहाल नई वार्ता की कोई तारीख घोषित नहीं हुई है। हालांकि दोनों पक्षों ने भविष्य की बातचीत की संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की है।

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बैक-चैनल बातचीत जारी रह सकती है, लेकिन तत्काल breakthrough की संभावना कम दिख रही है।

निष्कर्ष

Islamabad वार्ता की विफलता ने दिखा दिया कि अमेरिका और ईरान के बीच मतभेद अभी भी बहुत गहरे हैं। “Unreasonable Demands” बनाम “Final Offer” की यह लड़ाई अब केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता का बड़ा सवाल बन चुकी है।

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