आज सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के दौरान एक ऐसा नारा गूंजा, जिसने एक बार फिर से सियासी और सामाजिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। प्रदर्शनकारियों की भीड़ के बीच से अचानक ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ के नारे लगने लगे, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। जब भी किसी सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन में इस तरह के नारे लगते हैं, तो इसे लेकर तुरंत दो अलग-अलग नैरेटिव सामने आ जाते हैं। एक धड़ा इसे सीधे तौर पर धार्मिक भावना और कट्टरता से जोड़कर देखता है और विरोध प्रदर्शनों में इसके इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताता है, जबकि दूसरा पक्ष इसके साहित्यिक और ऐतिहासिक महत्व का हवाला देकर इसका बचाव करता है।

क्या है इस नारे का इतिहास ?

मूल रूप से ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ मशहूर और क्रांतिकारी शायर फैज़ अहमद फैज़ की कालजयी नज़्म ‘हम देखेंगे’ की एक अहम पंक्ति है। फैज़ ने यह नज़्म 1979 में पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह जिया-उल-हक के दमनकारी सैन्य शासन के खिलाफ लिखी थी, जिसका मकसद सत्ता के अहंकार को चुनौती देना था। लेकिन, जब हम भारत में इस नारे के इतिहास की बात करते हैं, तो इसके तार कश्मीर के उस बेहद काले और दर्दनाक दौर से जुड़ जाते हैं।

​1980 के दशक के अंत और 1990 की शुरुआत में जब कश्मीर घाटी में आतंकवाद और अलगाववाद अपने चरम पर था, तब इस नारे ने एक बिल्कुल अलग और खौफनाक रूप ले लिया था। घाटी में कश्मीरी पंडितों को डराने, उन्हें धमकियां देने और उन्हें उनके ही घरों से खदेड़ने के लिए मस्जिदों के लाउडस्पीकरों और सड़कों पर हथियारबंद आतंकियों द्वारा ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ जैसे नारों का जमकर इस्तेमाल किया गया था। कश्मीर के उस दौर में यह नारा किसी सत्ता के खिलाफ इंकलाब का नहीं, बल्कि धार्मिक उन्माद, खौफ और एक समुदाय के विस्थापन का प्रतीक बन गया था। यही वजह है कि भारत में जब भी यह नारा गूंजता है, तो कश्मीरी पंडितों और देश के एक बड़े वर्ग के ज़ेहन में उन पुराने जख्मों की यादें ताज़ा हो जाती हैं।

साहित्यिक अभिव्यक्ति या पुरानी खौफनाक यादों को ताज़ा करने की कोशिश?

भारत के मौजूदा संदर्भ में जब सड़कों पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच इस नारे को उछाला जाता है, तो विवाद होना पूरी तरह लाज़मी है। आलोचकों और जानकारों का मानना है कि प्रदर्शनों में चुनिंदा तौर पर इस लाइन का इस्तेमाल करने से आंदोलन का मूल मकसद भटक जाता है। कश्मीर के कड़वे इतिहास को देखते हुए इसे महज़ एक कविता की पंक्ति मान लेना कई लोगों के लिए संभव नहीं है, क्योंकि यह सीधे तौर पर समाज में ध्रुवीकरण और डर का माहौल पैदा करता है। सीजेपी के आज के प्रदर्शन में द्वारा इस नारे के लगाए जाने के बाद स्थानीय प्रशासन भी सतर्क हो गया है और इस बात पर नज़र बनाए हुए है कि कहीं इसके ज़रिए शांतिपूर्ण माहौल को बिगाड़ने या किसी खास समुदाय की भावनाओं को आहत करने की कोई कोशिश तो नहीं की गई।

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