भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है। देश के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट ने सफलतापूर्वक उड़ान भरकर इतिहास रच दिया है। इस लॉन्च के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों की लिस्ट में शामिल हो गया है, जहां प्राइवेट कंपनियों के पास सैटेलाइट्स को सीधे अंतरिक्ष की कक्षा (Orbit) में स्थापित करने की क्षमता है।

​लॉन्च के बाद से ही विज्ञान और तकनीक में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के मन में यह सवाल है कि मिशन के सफल होने के बाद आखिर रॉकेट और उसके साथ गए सैटेलाइट्स अब कहाँ हैं? आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक मिशन और इसके मौजूदा स्टेटस से जुड़ी हर बड़ी अपडेट।

मिशन की अहम बातें और रॉकेट की खासियत

​भारत के स्पेस सेक्टर में सालों तक केवल सरकारी एजेंसी का ही दबदबा रहा है, लेकिन अब प्राइवेट सेक्टर ने भी अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर दी है।

  • एडवांस तकनीक: इस मल्टी-स्टेज रॉकेट को ऑल-कार्बन कम्पोजिट स्ट्रक्चर से बनाया गया है, जो इसे हल्का और बेहद मजबूत बनाता है।
  • 3D प्रिंटेड इंजन: सबसे खास बात यह है कि इसमें 3D प्रिंटेड लिक्विड इंजन का इस्तेमाल किया गया है। इन इंजनों को अंतरिक्ष में भी चालू और बंद किया जा सकता है, जो सटीक ऑर्बिटल प्लेसमेंट के लिए बहुत जरूरी होता है।

लॉन्च के बाद अब कहाँ है रॉकेट?

विज्ञान के नजरिए से देखा जाए तो रॉकेट का मुख्य काम एक ‘डिलीवरी व्हीकल’ का होता है। यह पेलोड (सैटेलाइट्स) को अंतरिक्ष में उसकी मंजिल तक पहुँचाता है और फिर इसका काम खत्म हो जाता है।

  • शुरुआती स्टेजेस: लॉन्च के कुछ मिनटों बाद ही, प्रोग्रामिंग के तहत रॉकेट के निचले हिस्से (Stages) अलग हो गए और सुरक्षित तरीके से बंगाल की खाड़ी में जा गिरे।
  • आखिरी हिस्सा : रॉकेट का जो अंतिम हिस्सा सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में छोड़कर आया था, वह अब कुछ समय बाद धरती के वायुमंडल में वापस एंट्री करेगा। वायुमंडल के घर्षण के कारण यह हिस्सा जलकर नष्ट हो जाएगा। इसे इसलिए ऐसे डिजाइन किया गया है ताकि अंतरिक्ष में कचरा न फैले।

अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स का क्या है स्टेटस?

इस रॉकेट ने अपनी उड़ान में कई अहम पेलोड्स और सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में पहुँचाया है।

  • ​लो अर्थ ऑर्बिट : ये सभी सैटेलाइट्स इस वक्त पृथ्वी से लगभग 450 किलोमीटर ऊपर ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ में बिल्कुल सटीक जगह पर स्थापित हो चुके हैं।
  • रफ्तार और संपर्क: ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, ये सैटेलाइट्स करीब 27,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से धरती का चक्कर लगा रहे हैं। इन्होंने अपने सोलर पैनल खोल लिए हैं और सफलतापूर्वक ग्राउंड स्टेशन (धरती पर मौजूद कमांड सेंटर) से संपर्क भी स्थापित कर लिया है। अब इनका असल काम शुरू हो चुका है।

भारत के लिए क्यों गेम-चेंजर है यह सफलता?

यह कामयाबी सिर्फ एक रॉकेट लॉन्च तक सीमित नहीं है। ग्लोबल स्पेस इकोनॉमी में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए यह एक बहुत बड़ा कदम है। इससे न सिर्फ सैटेलाइट लॉन्चिंग का खर्च कम होगा, बल्कि भविष्य में विदेशी कंपनियां भी अपने सैटेलाइट्स लॉन्च करने के लिए भारत के प्राइवेट सेक्टर का रुख करेंगी। यह सफलता सही मायनों में स्पेस सेक्टर में ‘आत्मनिर्भर भारत’ की तस्वीर पेश करती है।

 

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