योगी सरकार में ‘बाहरी’ ब्राह्मण नेताओं का बढ़ता प्रभाव, 8 में 5 मंत्री यूपी से बाहरीयोगी सरकार में ‘बाहरी’ ब्राह्मण नेताओं का बढ़ता प्रभाव, 8 में 5 मंत्री यूपी से बाहरी

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटरों को अपने साथ बनाए रखने के लिए भाजपा दूसरे दलों से आए नेताओं पर भरोसा कर रही है। योगी सरकार में ब्राह्मण समाज के आठ मंत्रियों में से पांच नेता पहले अन्य पार्टियों में थे। 2022 में दोबारा सत्ता में आने के बाद भाजपा ने ऐसे नेताओं को अहम जिम्मेदारी दी। लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए जितिन प्रसाद केंद्र में मंत्री बने। वहीं, हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में समाजवादी पार्टी से भाजपा में आए मनोज पांडे को भी योगी सरकार में मंत्री बनाया गया है।

योगी मंत्रिमंडल का मौजूदा समीकरण

अगर मौजूदा योगी मंत्रिमंडल को देखें, तो कई ब्राह्मण मंत्री पहले दूसरे दलों में थे। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक और प्रतिभा शुक्ला पहले बसपा में थे। मनोज पांडे और रजनी तिवारी समाजवादी पार्टी से भाजपा में आए, जबकि दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। 2022 में भाजपा की सरकार दोबारा बनने के बाद कांग्रेस से आए जितिन प्रसाद को पीडब्ल्यूडी जैसा बड़ा विभाग दिया गया था। बाद में जितिन प्रसाद के केंद्र सरकार में मंत्री बनने पर उनकी जगह सपा से भाजपा में आए मनोज पांडे को योगी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया।

पुराने कार्यभाजपा के कर्ताओं को सीमित जगह, सिर्फ तीन ब्राह्मण चेहरे शामिल

योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल में भाजपा के पुराने और लंबे समय से जुड़े कार्यकर्ताओं में सिर्फ सतीश चंद्र शर्मा, सुनील शर्मा और योगेंद्र उपाध्याय को मंत्री बनाया गया है। इसके अलावा ज्यादातर ब्राह्मण चेहरे दूसरे दलों से भाजपा में आए नेताओं के हैं। पिछली सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे श्रीकांत शर्मा को इस बार मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। वहीं, पहले डिप्टी सीएम रहे दिनेश शर्मा को सरकार में शामिल करने के बजाय भाजपा ने राज्यसभा भेज दिया। इससे यह चर्चा बढ़ी है कि पार्टी अब ब्राह्मण नेताओं के लिए पुराने कार्यकर्ताओं से ज्यादा दूसरे दलों से आए चेहरों पर भरोसा कर रही है।

भाजपा की यह रणनीति क्यों

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज की आबादी लगभग 10 से 13 प्रतिशत है। यह समाज मुख्य रूप से पूर्वांचल, अवध और बुंदेलखंड क्षेत्रों में रहता है। राज्य की 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर इस समाज के वोट चुनाव का परिणाम तय करने में बहुत अहम होते हैं। कई बार चुनाव में जीत या हार ब्राह्मण वोटों पर निर्भर रही है। इसलिए राजनीतिक दल इस समाज के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं। पार्टी की रणनीति रही है कि अलग-अलग क्षेत्रों के मजबूत ब्राह्मण नेताओं को साथ रखकर चुनावी फायदा लिया जाए।

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