ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए भारत की ओर से एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ईरान की राजधानी तेहरान पहुंच चुका है। 28 फरवरी 2026 को एक हवाई हमले में खामेनेई के निधन के बाद, युद्ध की परिस्थितियों के चलते यह विदाई समारोह अब 3 से 9 जुलाई के बीच आयोजित किया जा रहा है।

​ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों की संवेदनशीलता को समझते हुए, भारत ने इस मौके पर एक संतुलित और महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई है।

आधिकारिक स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व

ईरान सरकार की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस समारोह में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया था। हालांकि, प्रधानमंत्री अपने पूर्व-निर्धारित इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड (8-11 जुलाई) के दौरे पर होने के कारण उपस्थित नहीं हो सके।

उनकी जगह भारत सरकार के आधिकारिक प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी दो प्रमुख हस्तियों को सौंपी गई है। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा कर रहे हैं। उनके साथ, भारतीय सेना के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी और बिहार के वर्तमान राज्यपाल, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन भी भारत सरकार के विशेष दूत के तौर पर इस डेलिगेशन का अहम हिस्सा हैं।

विपक्ष और क्षेत्रीय नेताओं की विशेष उपस्थिति

आधिकारिक सरकारी डेलिगेशन के अलावा, ईरान ने भारत के कई विपक्षी और क्षेत्रीय नेताओं को भी विशेष आमंत्रण भेजा है। कूटनीतिक हलकों में इसे ईरान की ओर से भारत के विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक वर्गों के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। इन विशेष आमंत्रित सदस्यों में जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद शामिल हैं, जिनका कूटनीतिक अनुभव इस दौरे को अहम बनाता है।

इनके साथ ही, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मौजूदा सांसद पवन खेड़ा और भारतीय शिया समुदाय का एक मजबूत धार्मिक व सामाजिक प्रतिनिधित्व कर रहे जम्मू-कश्मीर अंजुमन-ए-शरिया शियान के अध्यक्ष आगा सैयद हसन मौसवी अल सफवी भी इस दौरे पर गए प्रतिनिधिमंडल का अहम हिस्सा हैं।

एकजुटता का सर्वधर्म संदेश

राजनीतिक हस्तियों के अलावा, भारत से हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्मों के गुरुओं का एक सर्वधर्म (Interfaith) प्रतिनिधिमंडल भी तेहरान में मौजूद है। भारत ने इस कदम के जरिए यह स्पष्ट संदेश दिया है कि दोनों देशों के रिश्ते केवल कूटनीतिक और व्यापारिक नहीं हैं, बल्कि उनके बीच गहरी सांस्कृतिक और सामाजिक जड़ें भी हैं।

क्या हैं इसके कूटनीतिक मायने?

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के नजरिए से भारत का यह कदम बेहद सधा हुआ माना जा रहा है। खाड़ी क्षेत्र में चल रहे तनाव के बीच, भारत ने अपने इस प्रतिनिधिमंडल के जरिए स्पष्ट कर दिया है कि वह मध्य-पूर्व में शांति का पक्षधर है और ईरान जैसे अहम रणनीतिक साझेदार के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को पूरी अहमियत देता है।

 

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