भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते कूटनीतिक तनाव के बीच, दोनों देशों की 117 जानी-मानी हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शहबाज़ शरीफ़ को एक साझा खुला पत्र (Open Letter) लिखा है। इस पत्र में कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों (फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती) से लेकर कई दिग्गजों के नाम हैं, लेकिन भारत की खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ (RAW) के पूर्व प्रमुख अमरजीत सिंह दुलत (A.S. Dulat) की मौजूदगी ने इस नागरिक अपील को बेहद संवेदनशील और रणनीतिक बना दिया है। पत्र में क्या लिखा है? ’सेंटर फॉर पीस एंड प्रोग्रेस’ की अगुवाई में लिखे गए इस पत्र में दोनों देशों के बीच कड़वाहट कम करने के लिए एक स्पष्ट रोडमैप सुझाया गया है: पत्र में मांग की गई है कि अविश्वास को कम करने के लिए सबसे पहले नई दिल्ली और इस्लामाबाद में फिर से पूर्ण उच्चायुक्तों (High Commissioners) की नियुक्ति की जाए। दोनों सरकारों से अपील की गई है कि वे लंबित मुद्दों को सुलझाने के लिए ‘व्यापक द्विपक्षीय वार्ता’ दोबारा शुरू करें। इसमें साल 2004 से 2007 के बीच (वाजपेयी और मनमोहन सिंह के दौर में) तय हुए शांति फ्रेमवर्क का हवाला दिया गया है। आवाजाही और कनेक्टिविटी आम नागरिकों, छात्रों और पत्रकारों के लिए वीजा नियमों को आसान बनाया जाए। अटारी-वाघा बॉर्डर को व्यापार और यात्रियों के लिए फिर से खोला जाए। दोनों देशों के बीच एयरस्पेस (हवाई क्षेत्र) को कमर्शियल उड़ानों के लिए बहाल किया जाए। श्रीनगर-मुजफ्फरराबाद और दिल्ली-लाहौर बस सेवाओं को दोबारा शुरू किया जाए। करतारपुर साहिब कॉरिडोर की तर्ज पर ही, पाकिस्तान की नीलम घाटी में स्थित कश्मीरी पंडितों के पवित्र धार्मिक स्थल ‘शारदा पीठ’ तक भारतीय श्रद्धालुओं की पहुंच को सुगम बनाया जाए। एक पूर्व ‘स्पाय मास्टर’ का शांति संदेश: क्यों खास हैं दुलत के दस्तख़त? इंटेलिजेंस के शिखर पर ए.एस. दुलत केवल ‘रॉ’ के पूर्व चीफ (1999-2000) ही नहीं रहे, बल्कि वे इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के स्पेशल डायरेक्टर और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय PMO में कश्मीर मामलों के आधिकारिक सलाहकार भी रह चुके हैं। जब कोई राजनेता या सामाजिक कार्यकर्ता शांति की बात करता है, तो उसे अक्सर ‘आदर्शवाद’ कहकर टाल दिया जाता है। लेकिन जब देश का सबसे बड़ा पूर्व जासूस जिसने अपनी पूरी जिंदगी पाकिस्तान के ‘डीप स्टेट’ (Deep State) और खुफिया तंत्र को समझने में लगा दी शांति की वकालत करता है, तो उसके पीछे गहरी रणनीतिक समझ होती है। दुलत साहब का हमेशा से यह मानना रहा है कि बंदूकें या कूटनीतिक गतिरोध कभी भी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकते। वे कश्मीर और पाकिस्तान के संदर्भ में ‘बैक-चैनल डिप्लोमेसी’ (परदे के पीछे की बातचीत) के सबसे बड़े समर्थक माने जाते हैं। मौजूदा माहौल और सरकारी रुख इस पत्र को केवल एकतरफा शांति अपील के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि इसके पीछे का मौजूदा बैकग्राउंड काफी तनावपूर्ण है। एक तरफ जहाँ भारत सरकार ने सीमा पार आतंकवाद (विशेषकर हालिया पहलगाम हमले) के विरोध में 1960 की ‘सिंधु जल संधि’ को फिलहाल स्थगित कर रखा है, जिससे पाकिस्तान बेहद बौखलाया हुआ है। वहीं दूसरी तरफ भारत सरकार का स्टैंड भी हमेशा की तरह कड़ा बना हुआ है; बीजेपी महासचिव तरुण चुघ सहित पूरी सरकार का साफ़ मानना है कि “आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते” और जब तक पाकिस्तान अपनी सरजमीं से आतंकवाद को पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक किसी भी तरह की बातचीत का सवाल ही नहीं उठता। इस संवेदनशील मुद्दे पर भारत के भीतर भी राजनीतिक मतभेद साफ़ दिखाई दे रहे हैं, जहाँ विपक्ष के नेता मनोज झा (RJD) ने ‘पीपल टू पीपल कांटेक्ट’ (जनता के बीच जुड़ाव) का हवाला देकर इस शांति पत्र का समर्थन किया है, वहीं कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने पाकिस्तान के साथ इस तरह की किसी भी बातचीत के विचार का कड़ा विरोध किया है। यह पत्र दोनों देशों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने की एक बड़ी कोशिश है, जिसमें एक पूर्व खुफिया प्रमुख (Dulat) की मौजूदगी इसके रणनीतिक वजन को बढ़ाती है। हालांकि, सीमा पार आतंकवाद और पानी (Indus Water) के विवाद को देखते हुए यह देखना चुनौतीपूर्ण होगा कि दोनों देशों की सरकारें इन सुझावों को कितनी गंभीरता से लेती हैं। Post navigation जयराम रमेश का हमला, चुनाव आयोग से लेकर राम मंदिर चंदा विवाद तक उठाए कई सवाल अयातुल्ला अली खामेनेई का राजकीय अंतिम संस्कार: ईरान में भारत का सर्वधर्म संदेश