देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) से एक बेहद हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। न्याय के मंदिर में जहां बड़े-बड़े दिग्गज वकील भी जजों के सामने बोलने से पहले शब्दों का चयन बेहद सोच-समझकर करते हैं, वहीं एक लॉ स्टूडेंट ने सारी मर्यादाएं लांघ दीं। खुद अपनी पैरवी कर रहे इस छात्र ने सरेआम जजों के सामने ऐसा बर्ताव किया, जिसने पूरे लीगल सिस्टम को स्तब्ध कर दिया है।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच के समक्ष एक मामले की सुनवाई चल रही थी। इस मामले में याचिकाकर्ता एक लॉ स्टूडेंट था, जो बिना किसी वकील के खुद अपनी दलीलें पेश कर रहा था इसे कानूनी भाषा में ‘पिटीशनर-इन-पर्सन’ कहा जाता है।

​सुनवाई के दौरान जब बेंच ने उसकी दलीलों को कानूनी कसौटी पर अपर्याप्त पाया और उसके मनमुताबिक आदेश पारित करने से इनकार कर दिया, तो माहौल अचानक गर्म हो गया। छात्र कानूनी प्रक्रिया को समझने के बजाय बेंच से ही उलझ पड़ा।

“ये लो, CJI को दे देना…”

​जब छात्र को यह स्पष्ट हो गया कि कोर्ट उसकी याचिका खारिज करने वाली है, तो उसने अपना आपा खो दिया। कोर्ट के अनुशासन और डेकोरम की धज्जियां उड़ाते हुए उसने अपने केस की फाइल और कागजात जजों की तरफ बढ़ा दिए। इसके बाद उसने बेहद अक्खड़ और अभद्र लहजे में कहा, “ये लो, जाकर CJI को दे देना।”

​देश की सर्वोच्च अदालत में जजों के सामने इस तरह की भाषा और लहजे का इस्तेमाल एक अभूतपूर्व घटना थी। कोर्ट रूम में मौजूद तमाम वकील और कोर्ट स्टाफ इस दुस्साहस को देखकर सन्न रह गए।

​जजों का सख्त एक्शन

सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस बदसलूकी पर तुरंत और सख्त ऐतराज जताया। जजों के सामने इस तरह का बर्ताव सीधे तौर पर ‘अदालत की अवमानना’ (Contempt of Court) की श्रेणी में आता है। बेंच ने बिना एक पल गंवाए कोर्ट रूम की सुरक्षा में तैनात मार्शल्स को तलब किया और निर्देश दिया कि इस व्यक्ति को तुरंत कोर्ट रूम से बाहर निकाला जाए।

कानूनी हलकों में छिड़ी बहस

इस वाकये के बाद लीगल कम्युनिटी और सोशल मीडिया पर एक नई बहस छिड़ गई है। वकीलों का मानना है कि कानून की पढ़ाई कर रहे एक छात्र को कम से कम अदालत के बुनियादी शिष्टाचार का ज्ञान होना चाहिए। इसके साथ ही, ‘पिटीशनर-इन-पर्सन’ द्वारा कोर्ट का कीमती समय बर्बाद करने और जजों के साथ अभद्रता करने के मामलों को लेकर भी चिंता जताई जा रही है।

​सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह स्पष्ट कर चुका है कि कोर्ट रूम कोई आम सार्वजनिक मंच नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक संस्था है, जिसका सम्मान करना हर नागरिक, विशेषकर कानून के छात्रों का पहला कर्तव्य है।

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