Iran युद्ध और Middle East में बढ़ते तनाव के बीच भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित असर को लेकर चर्चा तेज है। इसी बीच एक पूर्व RBI गवर्नर ने कहा है कि भारत आज 2013 की तुलना में कहीं बेहतर स्थिति में है और बाहरी झटकों का सामना करने की क्षमता पहले से अधिक मजबूत है।

उनका कहना है कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार, बैंकिंग प्रणाली, वित्तीय स्थिरता और नीतिगत ढांचे में पिछले एक दशक के दौरान उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जिससे वैश्विक संकटों का प्रभाव सीमित किया जा सकता है।

2013 और 2026 में क्या है बड़ा अंतर?

2013 में भारत को “Taper Tantrum” संकट का सामना करना पड़ा था। उस समय रुपये पर भारी दबाव था, चालू खाते का घाटा ऊंचा था और विदेशी निवेश के बाहर जाने से वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई थी।

इसके विपरीत, वर्तमान समय में भारत के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, बेहतर बैंकिंग निगरानी और अधिक विविध आर्थिक आधार मौजूद है। हालांकि Iran युद्ध के कारण तेल की कीमतों और रुपये पर दबाव बना है, लेकिन स्थिति 2013 जैसी नहीं मानी जा रही।

Iran युद्ध से भारत को किन चुनौतियों का सामना?

Middle East में संघर्ष बढ़ने से सबसे बड़ा असर ऊर्जा आयात पर पड़ सकता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि महंगाई और व्यापार घाटे को प्रभावित कर सकती है।

हाल के महीनों में रुपये में कमजोरी भी देखी गई है और RBI को बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ा है ताकि अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके।

RBI और सरकार के पास कौन से विकल्प?

विशेषज्ञों का मानना है कि RBI के पास मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप, डॉलर तरलता बढ़ाने और अन्य नीतिगत उपायों जैसे कई विकल्प मौजूद हैं। फिलहाल अधिकांश अर्थशास्त्री उम्मीद कर रहे हैं कि RBI सावधानीपूर्ण रुख अपनाएगा और महंगाई तथा विकास दोनों पर नजर रखेगा।

सरकार भी ऊर्जा आपूर्ति और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए विभिन्न विकल्पों पर विचार कर रही है।

भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर क्या है भरोसा?

कई अर्थशास्त्रियों और वैश्विक संस्थानों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है। मजबूत घरेलू मांग, सरकारी निवेश और सेवाक्षेत्र की मजबूती को भारत की प्रमुख ताकत माना जा रहा है।

हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि Middle East संकट लंबा खिंचता है या तेल की कीमतें और बढ़ती हैं, तो आर्थिक चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं।

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