पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद भाजपा अब अपने अगले राजनीतिक अभियान में जुट गई है। चुनाव परिणामों के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पार्षदों के लगातार इस्तीफों ने भाजपा के लिए नई संभावनाओं के रास्ते खोल दिए हैं। बड़ी संख्या में हो रहे इस्तीफों के चलते कई नगर निकायों के बोर्ड भंग होने की स्थिति बन रही है, जिसका फायदा उठाकर भाजपा समय से पहले स्थानीय निकाय चुनाव कराने की रणनीति पर काम कर सकती है। राज्य में कुल 125 शहरी स्थानीय निकाय हैं, जिनमें 108 नगरपालिकाएं और 7 नगर निगम शामिल हैं। इनमें अधिकांश पर फिलहाल टीएमसी का नियंत्रण है। विशेष रूप से फाल्टा विधानसभा सीट के चुनाव परिणाम आने के बाद टीएमसी पार्षदों के इस्तीफों का सिलसिला तेज हो गया है। अब तक सात नगरपालिकाओं के 100 से ज्यादा पार्षद अपने पद छोड़ चुके हैं। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार को कई जगह प्रशासक नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी है। नई सरकार की जांच घोषणा से मचा हड़कंप नई सरकार बनने के बाद नगर निकायों के काम और खर्चों की जांच शुरू कर दी गई है। जांच के ऐलान के बाद नगर निकायों में हलचल बढ़ गई है। कई नेताओं और पार्षदों को अब टीएमसी में अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित नहीं लग रहा है। इसी वजह से पार्टी के कई पार्षद दूसरी पार्टी में जाने या इस्तीफा देने की तैयारी में हैं। लगातार हो रहे इस्तीफों से टीएमसी की चिंता बढ़ती जा रही है। राजनीतिक माहौल तेजी से बदल रहा है और इसका असर स्थानीय निकायों की स्थिति पर भी साफ दिखाई दे रहा है। ममता की रणनीति आखिर कहां हुई कमजोर? पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की योजना थी कि स्थानीय निकायों के जरिए पार्टी की ताकत बनाए रखी जाए। लेकिन फाल्टा उपचुनाव के नतीजों ने पार्टी को बड़ा झटका दिया। इस सीट पर भाजपा ने करीब एक लाख वोटों से जीत हासिल की। चुनाव के बाद टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास कमजोर पड़ता दिख रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि कोलकाता के मेयर और ममता बनर्जी के करीबी नेता फिरहाद हकीम ने पद छोड़ने की इच्छा जताई है। इन घटनाओं से पार्टी के भीतर बढ़ती चिंता और दबाव साफ नजर आ रहा है। Post navigation Indian National Congress ने DMK के ‘Vijay पर कभी भरोसा नहीं’ बयान को बताया “अस्वीकार्य”